मंगलवार, 31 मार्च 2009

वोटकामी राजनीति का चरमोत्कर्ष

पीलीभीत में संसदीय सीट से भाजपा के उम्मीदवार वरुण गांधी पर उत्तर प्रदेश सरकार ने रासुका लगा दिया है। इससे पूर्व उन पर हत्या का प्रयास और दंगा भड़काने की कोशिश का मुकदमा दर्ज किया गया था। उन मामलों में वरुण की जमानत पर सोमवार को सुनवाई होनी थी। रासुका लगाने से अब ये धाराएं गौण हो गई हैं। रासुका ऐसे व्यक्ति पर लगाई जाती है जिससे बड़े पैमाने पर जनता कि सुरक्षा को खतरा पैदा होता हो। तीन माह के भीतर यदि रासुका का अनुमोदन हो गया तो वरुण की जमानत एक साल तक नहीं हो पाएगी। यानी उन्हें साल भर जेल में रहना पड़ेगा। रासुका की जटिल प्रक्रिया से यदि वरुण उबरे भी तो वे चुनाव से पहले जेल से बाहर नहीं आ सकते। फिलहाल रासुका को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। इस मामले को राज्यपाल के विचारार्थ भी भेजा जा सकता है। क्या वरुण गांधी से वाकई जनता कि सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया था? क्या किसी राजनीतिक व्यक्ति पर रासुका तामील की जा सकती है? देश में आपातकाल के बाद वरुण गांधी पहले राजनीतिक व्यक्ति हैं जिनपर रासुका लगाया गया है। रासुका से पहले लगाई गईं 6 धाराएं जिनमें हत्या का प्रयास यानी धारा 307 भी शामिल था, राज्य सरकार को पर्याप्त नहीं लगी थी। उल्लेखनीय है धारा 307 में भी वरुण की जमानत सीजेएम की अदालत में नहीं होती। इसके लिए उन्हें सेशन कोर्ट में याचिका दाखिल करनी पड़ती या फिर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ता। पीलीभीत में चुनावी भाषण से पूर्व वरुण गांधी पर ऐसे संगीन आपराधिक मामले कभी दायर नहीं किए गए थे लेकिन राज्य सरकार को लोकसभा के इस नौजवान प्रत्यासी से प्रदेश की जनता कि सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ और उसने समस्त लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करते हुए उसके खिलाफ ऐसा क्रूर कदम उठाया जिसकी कल्पना भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में कतई नहीं की जा सकती थी। कोई तानाशाह ही ऐसा कर सकता था। आखिर मुख्यमंत्री मायावती ने वरुण गांधी के खिलाफ ऐसा अलोकतांत्रिक कदम क्यों उठाया...मीडिया में इस तरह की खबरें आने लगी थी कि भाजपा बतौर स्टार प्रचारक वरुण गांधी का उपयोग करने वाली है। पीलीभीत की सभा में अपने पहले भाषण के बाद चुनाव आयोग, मीडिया और विपक्षी नेताओं ने जाने-अनजाने वरुण गांधी को ‘स्टार’ बना भी दिया था। उत्तर प्रदेश की जनता में उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी थी। राज्य सरकार को अपने खुफिया सूत्रों से भी इस बात की सूचना मिली होगी कि वरुण गांधी के प्रचार से राज्य में चुनावी फिजा बदल सकती है और भाजपा को अपेक्षा से अधिक सीटें मिल सकती हैं। हो सकता है इस आंकलन और सूचना ने मुख्यमंत्री को इस तरह की क्रूर और चरमपंथी कदम उठाने के लिए विवश कर दिया हो ताकि वरुण गांधी भाजपा का प्रचार कर ही न सकें, लेकिन यह दांव उलटा भी पड़ सकता है। वरुण और भाजपा के प्रति जनता कि सहानुभूति बढ़ सकती है जैसे 1977 के लोकसभा चुनाव में आपातकालीन अत्याचारों के खिलाफ जनता में ऐसी लहर पैदा हुई कि कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ हो गया। वरुण गांधी पर रासुका लगाने का एक और उद्देश्य हो सकता है- ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम वोट हथियाया जाए। सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता मुलायम सिंह के साथ थे लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के गुनहगार माने जा रहे कल्याण सिंह से दोस्ती के बाद मुलायम सिंह के प्रति मुसलमानों के मन में नफरत पैदा हो गई है और लाख प्रयासों तथा सफाई देने के बावजूद राजनीतिक प्रेक्षकों को नहीं लगता कि इस चुनाव में सपा के साथ होंगे। सपा से बिदके मुस्लिम मतों को हथियाने का प्रयास बसपा भी कर रही है और कांग्रेस भी। पीलीभीत में वरुण गांधी के चुनावी भाषण और उनकी सभाओं में उमड़ी भीड़ ने गैर-भाजपाई खेमे में हलचल पैदा की थी। कांग्रेस ने वरुण की तीखी आलोचना की थी और उनके भाषण को सांप्रदायिक विद्वेष पैदा करने वाला बताया था। कुछ नेताओं की प्रतिक्रियाएं मुसलमानों को खुश करने वाली थी। उनका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय की सहानुभूति प्राप्त करना था। इस उद्देश्य को एक हद तक चुनाव आयोग ने पूरा किया, फिर बसपा क्यों पीछे रहती- जिसके पास उत्तर प्रदेश की सत्ता का बल था। बसपा सरकार ने पहले वरुण गांधी पर संगीन धाराएं लगाईं फिर उससे कई कदम आगे जाकर उन पर रासुका तामील कर दी। अब मुख्यमंत्री इस बात से जरूर संतुष्ट होंगी की वरुण पर रासुका के बाद मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव बसपा की तरफ अवश्य हुआ होगा। मुख्यमंत्री का यह कदम देश की वोटकामी राजनीति की चर्मोत्कर्ष है। उनका खुफिया तंत्र चाहे जो रिपोर्ट दे लेकिन जनता अच्छी तरह समझ रही है कि इस सारे खेल का एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम मत बटोरना ही है यानी यह सब वोट की राजनीति के चलते ही संभव हो पाया है। बहरहाल वरुण पर रासुका उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोकता और भाजपा ने एलान भी कर दिया है कि वरुण उसके उम्मीदवार रहेंगे। भाजपा नेता रासुका को एक राजनीतिक कदम मान रहे है और पूरे प्रदेश में इसे भुनाने की तैयारी में जुट गए हैं। वरुण की मां मेनका गांधी ने इसे वरुण को अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घेरने की साजिश करार दिया है और कहा है कि हम लोग इससे जरा भी विचलित नहीं हैं। पीलीभीत को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। वरुण के साथ जो कुछ हुआ है उसका प्रदेश की जनता पर असर देखने के लिए हमें चुनाव परिणाम की प्रतीक्षा करनी होगी।

रविवार, 29 मार्च 2009

ये कैसा इंसाफ?

तीन खबरें लगभग एक साथ पढ़ने को मिली । समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को क्लीन चिट दे दी। मुलायम पर मैनपुरी की महिला जिला अधिकारी को धमकाने का आरोप था। उसकी शिकायत स्वयं जिला अधिकारी ने सबूतों के साथ चुनाव आयोग को भेजी थी। आयोग ने विचार विमर्श के बाद उसमें कोई आपत्ति जनक चीज नहीं पाई। जिससे मुलायम को आचार संहिता के उल्लघंन का दोषी पाया जाए। लिहाजा, मुलायम को क्लीन चिट दे दी गई। दूसरी घटना के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री और इस चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार जगदीश टाइटलर को 1984 के सिख विरोधी दंगे में लिप्त रहने के आरोप से बरी कर दिया गया है। मामले की जांच कर रही सीबीआई को टाइटलर के खिलाफ 'ठोस सबूत' नहीं मिला है जिसके आधार पर उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके। सीबीआई ने कहा है कि कैलिफोर्निया के दो सिखों जसवीर सिंह और सुरिंदर सिंह के इन आरोपों में कोई दम नहीं है कि जगदीश टाइटलर ने 1984 के दंगों में हिंदुओं को सिखो पर हमले के लिए उकसाया था। सीबीआई ने दिल्ली की कड़कड़डूमा स्थित मेट्रोपोलिटन अदालत में इस मामले से जुड़ी अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश की है। यह रिपोर्ट दस गवाहों के बयानों पर आधारित है। कांग्रेस द्वारा जगदीश टाइटलर को लोकसभा का उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा की सिख संगठनों ने कड़ी आलोचना की थी। इन्ही आलोचनाओं के बीच सीबीआई प्रमुख ने गृह मंत्री पी चिदंबरम से मुलाकात की थी, जिसकी माकपा ने कड़ी निंदा की थी। इस मामले की सुनवाई अदालत में होनी है। अदालत सीबीआई की रिपोर्ट पर विचार करेगी। तीसरी महत्वपूर्ण घटना के अनुसार पीलीभीत से भाजपा के उम्मीदवार वरुण गांधी ने 28 मार्च को पीलीभीत की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था। अदालत ने उन्हें दो दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। वरुण गांधी पर आरोप था कि उन्होंने पांच मार्च को पीलभीत की एक सबा मे भाड़काऊ भाषण दिया। इस भाषण की सीडी इलेक्ट्रानिक मीडिया ने 16-17 मार्च को प्रमुख्ता से दिखाया जिसे चुनाव आयोग ने संज्ञान में लिया और भाजपा को सलाह दी कि वो वरुण गांधी को उम्मीदवार न बनाए। यानी आयोग ने सीडी में कही गई बातों को सही माना और वरुण गांधी को अपना पक्ष रखने का कोई मौका नहीं दिया। इस संबंध में वरुण का कहना है कि उनके भाषण को जो सीडी तैयार की गई है उससे छेड़छाड़ की गई है। उनकी बातों को संदर्भ से अलग करके दिखाया गया है। वरुण को उनके इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला कि पांच मार्च को दिए गए उनके चुनावी भाषण की सीडी 16-17 मार्च को मीडिया ने क्यों दिखाया। उनके भाषण और उसके प्रसारण के बीच 11 दिनों का अंतर क्यों था। बहरहाल वरुण गांधी के खिलाफ बरखेड़ा थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई और पुलिस ने मामले क तहकीकात शुरू कर दी है। इस मामले में वरुण गांधी को किसी भी दिन गिरफ्तार किया जा सकता था इसलिए उन्होंने पीलीभीत की अदालत में आत्मसमर्पण करना उचित समझा। पुलिस वरुण को गिरफ्तार इसलिए नहीं कर रही थी क्योंकि उसे उपर से हरी झंडी का इंतजार था, और हरी झंडी इसलिए नहीं मिल रही थी क्योंकि वरुण को चुनावी लाभ मिलने की संभावना थी। वरुण ने स्वयं अदालत में हाजिर होकर सरकार के इरादो पर पानी फेर दिया और पीलीभीत की जनता का अपूर्व समर्थन तथा सहानुभूति अर्जित कर ली। अब उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार वरुण पर रासुका लगाने पर विचार कर रही है। वो इस अवसर को मुसलमानों के वोट के रुप में भुनाना चाह रही है। पीलीभीत में वरुण गांधी जब अदालत जा रहे थे तो उनके साथ करीब 25 हजार लोगों की भीड़ थी जिसे तितर बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज और फायरिंग तक करनी पड़ी थी। राज्य सरकार वरुण पर रासुका लगाकर उनकी लोकप्रियता को मुस्लिम वोटों में तब्दील करना चाहती है। बहरहाल इन तीनो घटनाओं यानी मुलायम को चुनाव आयोग की क्लीन चिट, जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीन चिट और वरुण गांधी को चुनाव आयोग द्वारा अपराधी करार देने तथा उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा रासुका लगाने की तैयारी करने जैसी कठोर कार्रवाई के बीच पक्षपातपूर्ण रवैये की गंध नहीं आ रही है? इन तीनों घटनाओं में केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जो रुख अपनाए गए या अपनाए जा रहे हैं। क्या वो निस्पक्षता और नैसर्गिक न्याय की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं? जगदीश टाइटलर का नाम सिख विरोधी दंगों में उसी समय उभरा था जब दंगे हुए थे। देश का लगभग हर जागरुक नागरिक इस सच्चाई से इत्तफाक रखता था। लेकिन सीबीआई को उनके खिलाफ ‘ठोस सबूत’ नहीं मिले इसलिए उसने कांग्रेस के इस उम्मीदवार और पूर्व मंत्री को क्लीन चिट दे दी। कुछ ऐसा मामला मुलायम सिंह का भी है। उनके खिलाफ शिकायत एक जिलाधिकारी ने की जो महिला है। इस महिला अधिकारी की शिकायत को गंभीरता से लेने की बजाय चुनाव आयोग ने मुलायम सिंह को बरी कर दिया। जबकि इस शिकायत को महिला उत्पीड़न कानून के तहत संज्ञेय अपराध माना जा सकता था। दूसरी तरफ वरुण गांधी जैसे नौजवान उम्मीदवार के खिलाफ रासुका लगाने की तैयारी हो रही है। मान लिया कि वरुण गांधी ने भड़काऊं भाषण दिया था, तो क्या इसे उनकी पहली गलती मानकर क्षमा नहीं करना चाहिए। जब जगदीश टाइटलर जैसे जगजाहिर दंगाई और मुलायम जैसे महिला अधिकारी को धमकाने वाले वरिष्ठ नेता को उनके अपराधों से मुक्त किया जा सकता है तो वरुण गांधी को क्यों नहीं मुक्त किया जा सकता। एक तरफ तो माया सरकार मुख्तार अंसारी जैसे माफिया डॉन को अपना उम्मीदवार बना रही है। दूसरी तरफ वरुण गांधी के खिलाफ रासुका लगाने की तैयारी कर रही है। क्या यही न्याय है? जो मीडिया वरुण गांधी के मामले में चीख पुकार मचा रही है। उसने बाकी दो मामलो में चुप्पी साथ लेना जरुरी क्यों समझा? क्या ये मामले वोट की राजनीति से प्रेरित नहीं हैं।

बुधवार, 25 जून 2008

दिल्ली मिलने से रहा यूपी भी जा रहा मुलायम के हाथ से

सपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने भी एक मोर्चा बनाया है। इनमें जो दल शामिल हैं उनमें तेलगु देशम को छोड़ कर किसी का भी अपने प्रदेश में जनाधार नहीं है। उत्तर प्रदेश में तो सपा के अलावा किसी भी अन्य दल का मानो निशान भी नहीं है। आंध्र प्रदेश में तेलगु देसम की कांग्रेस से कड़ी प्रतिस्पर्धा है। सपा महाराष्ट्र में शायद एक- दो सीट निकाल ले लेकिन उसके अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में बसपा से कड़ा मुकाबला है। फिलहाल जो राजनीतिक समीकरण है उसमें बसपा सपा से मीलों आगे है। ऐसी स्थिति में लोक सभा का अगला चुनाव मुलायम सिंह के लिए काफी बोझिल पड़ेगा।

लेकिन उनके निकटतम सहयोगी अमर सिंह ने भरोसा दिलाया है कि राजनीतिक जोड़-तोड़ में अपनी निपुणता के चलते वे मुलायम सिंह को देश का अगला प्रधानमंत्री बना देंगे। अमर सिंह ने कांग्रेस से नजदीकी कायम कर ली है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से साठ-गांठ कर बसपा का मुकाबला करने की योजना बना रहे हैं। सीटों के बटवारे को लेकर एकता न भी संभव हो तो चुनाव के बाद जोड़-तोड़ कर यदि कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनी तो मुलायम सिंह और अमर सिंह केंद्रीय मंत्रीमंडल में होंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री शिवराज पाटील से अमर सिंह की लंबी वार्ता हो चुकी है। जैसा की अमर सिंह की आदत है कि वह हर चाल में पहले अपनी गोटी लाल कर लेते हैं, इस वार्ता में भी उन्होंने अपना निजी हित साध लिया केंद्र सरकार से जेड श्रेणी की सुरक्षा ले ली। भविष्य में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा इसका आंकलन आज कि तारीख में नामुमकिन है किन्तु अमर सिंह का अपना हित तो सध ही गया।

जहां तक कांग्रेस का सवाल है 2004 के लोक सभा चुनाव के बाद जितने भी चुनाव हुए सभी में उसे पराजय ही हाथ लगी है। कर्नाटक विधान सभा चुनाव में उसकी हार को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। भाजपा नें कर्नाटक के रास्ते दक्षिण भारत के किले में प्रवेश कर लिया है। कर्नाटक में कांग्रेस कि हार को यदि हम भविष्य के लिए संकेत माने तो अगले लोक सभा चुनाव में उसके आसार अच्छे नहीं दिखाई देते। कांग्रेस की गठबंधन की सरकार केंद्र में बने इसके लिए स्वयं कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा सीटें प्राप्त करनी होगी। पिछले चुनाव में मात्र 7 या 9 सीटों से पिछड़ने के कारण भाजपा के गठबंध की सरकार बनने से रह गई थी। लगातार चुनावी पराजयों से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है। उसे सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व पर भी भरोसा नहीं रह गया है। राहुल गांधी के अपरिपक्व नेतृत्व के प्रति जनता में कोई खास रुझान नहीं है। सोनिया गांधी पता नहीं क्यों प्रियंका को आगे लाना नहीं चाहतीं जबकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका आकर्षक व्यक्तित्व कांग्रेस की गिरती साख को रोक सकती है या अगले चुनाव में उसकी नैया पार लगा सकती है। लेकिन सोनिया अपने पुत्र मोह के कारण प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाना नहीं चाहती। उन्हे भय है कि प्रियंका राहुल गांधी को पीछे धकेल देंगी। बहरहाल ये नेहरु परिवार का अपना अंदरुनी मामला है लेकिन एक बात तो सच हैं ही कि सोनिया गांधी के कांग्रेस नेतृत्व संभालने के समय कांग्रेस जनो में जो उत्साह था वह अब नहीं दिखाई दे रहा है।

केंद्र सरकार के तमाम उपायों के बावजूद महंगाई के लगातार बढ़ने और पेट्रोलियम पदार्थों में भारी बढोतरी से कांग्रेस के ग्राफ में काफी गिरावट आई है जिसकी भरपाई अगले आम चुनाव में होना बेहद कठिन लग रहा है। इसका असर उन दलों पर पड़ना स्वभाविक है जो पिछला चुनाव कांग्रेस से मिलकर लड़े थे। ये दल अगले चुनाव में क्या रणनीति अपनाते हैं, इस बारे में फिलहाल दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता किन्तु इनमें से कुछ यदि भाजपा गठबंधन में शामिल हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

उधर मुलायम के लाख प्रयास के बावजूद वामपंथी दल उनके तृतीय मोर्चे में शामिल नहीं हो रहे हैं तो इसका कारण यह है की वे इसके फायदे नुकसान के गणित से पूरी तरह वाकिफ हैं वे जानते हैं कि एक तो मुलायय उन्हें उत्तर प्रदेश में ज्यादा सीटे देंगे नहीं, दूसरे जो सीटे देंगे भी उस पर सपा के भरोसे जीत हासिल नहीं की जा सकती क्योंकि सपा का अपना जनाधार भी काफी खिसक गया है। दूसरे शब्दों में कहे तो अमर सिंह ने मुलायम सिंह कि स्वयं की लोकप्रियता काफी कम कर दी है। अब उनकी छवि जमीनी नेता कि जगह हाई टेक नेता की रह गई है। सपा नेताओं में भी उत्साह कि जगह निराशा ने घर कर लिया है। इसके विपरीत बसपा समर्थक उत्साह से लबालब हैं। कांग्रेस और सपा मिलकर भी बसपा का मुकाबला करने के स्थिति में नहीं है इसलिए वामपंथी दलों में सपा गठबंधने में शामिल होने में कोई रुची नहीं है। सपा कि अलोकप्रियता का इससे बढ़ कर उदाहरण क्या हो सकता है कि कुछ माह पहले उत्तर प्रदेश में हुए लोक सभा और विधान सभा के उप चुनावों में बसपा में न केवल सभी सीटों पर विजय दर्ज की वरन वे सीटें भी जीती जिन पर सपा काबिज थी।

मुलायम सरकार कि धमा चौकड़ी के विपरीत मायावती के एक साल के शासन काल में ना केवल हर क्षेत्र में सुधार के लक्षण दिखाई दे रहें हैं वरन सामाजिक सौहार्द का माहौल भी बना है। सबसे बड़ी बात यह है की मायावती अपनी पार्टी के उन नेताओं को भी कानून का पाठ पढा़ रहीं हैं जो सत्ता के मद में आ कर गैर कानूनी हरकतें कर रहें हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी पार्टी के सचिव और झारखण्ड के प्रभारी राम दक्षपाल को जेल में डलवा दिया। जिन्होंने दलितों पर गोली चलवा कर एक की जान ले ली और कई को घायल कर दिया। पार्टी के सांसद रमाकांत यादव तो सरकार बनाने के पहले ही जेल में बंद हैं। उन्हें मायावती ने अपने आवास से गिरफ्तार करवाया था। कुल मिलाकर उनके सरकार के प्रति जनता का रुझान बढा़ है। लोग समझने लगें हैं कि इस बार मायावती सही मायने में सर्वजन हिताए के लिए काम कर रही हैं।

जहां तक भाजपा का सवाल है कर्नाटक में विजय के बाद से उसके मनोबल में काफी इजाफा हुआ है। बनारस नगर निगम के उप चुनाव में एक सीट सपा से छीनने में वह कामयाब हुई है। लोक सभा चुनाव में अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम उसे मिल सकते हैं। उत्तर प्रदेश में कई सीटे यदि भाजपा और बसपा अगर मिलकर बांट ले तो अचरज की बात नहीं होगी। कुल मिलाकर यह कि केंद्र तो मुलायम सिंह को मिलने से रहा, उत्तर प्रदेश उनके हाथ से जा रहा है।

फिलहाल तो उत्तर प्रदेश मायावती का ही है।

उत्तर प्रदेश को ले कर विभिन्न राजनीतिक पार्टियां चाहे जो दावा करें लेकिन यह राज्य फिलहाल तो मायावती का ही लगता है। मायावती का एक साल का शासन काल इसकी गवाही देता है। राज्य की स्थिति में चौतरफा सुधार हुआ है, यह उत्तर प्रदेश की जनता अच्छी तरह महसूस कर रही है। कानून व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मुलायम सिंह यादव कि तरह मायावती अपनी पार्टी के अपराधियों को बचा नहीं रही हैं। उनके पास कोई मुख्तार अंसारी नहीं है जिसके अपराधों पर पर्दा डालने के लिए मुलायम ने हर हथकंडा अपनाया था। कानून की निगाह में सभी बराबर हैं, यह उसी दिन सिद्ध हो गया था जब मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद अपनी पार्टी के सांसद उमाकांत यादव को अपने निवास से गिरफ्तार करवाया था। यही नहीं उन पर गैंगेस्टर एक्ट लगाया गया और वह अभी भी जेल में है। यादव कमजोर लोगों कि दुकानों पर बुल्डोजर चलवाने के बाद संरक्षण पाने कि आशा से मायावती के आवास पर गए थे लेकिन मायावती ने उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया। यही नहीं मायावती ने दो अपराधी मंत्रियों जमुना प्रसाद निषाद और आनंद सेन यादव तथा पार्टी के सचिव राम दक्षपाल को कानून के हवाले कर दिया। इसका जनता में अच्छा संदेश गया है। मुलायम सिंह यदि मुख्यमंत्री होते तो क्या करते, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश को अपनी जागीर की तरह चला रहे थे। उनका पूरा परिवार सांसद या विधायक तो है ही, अमर सिंह सुपर मुख्यमंत्री की भूमिका में थे। उनकी बात टालने की हैसियत किसी में नहीं थी और वह अपने तथा अपने मित्रों के कल्याण में लगे हुए थे। उनकी भूमिका आज भी यथावत है। यह उन्हीं की देन है कि पार्टी का आम कार्यकर्ता मुलायम सिंह से दूर होता जा रहा है। वह सोचता है कि पुलिस की लाठियां खाने के लिए तो वह है लेकिन मलाई खाने के लिए मुलायम का परिवार और अमर सिंह तथा उनका कुनबा है। यही कारण है कि शिवपाल सिंह यादव का करो या मरो का आवाह्न फ्लाप हो गया। अब उनकी अपील पर कार्यकर्ता मरने के लिए तैयार नहीं है। शिवपाल को तो छोड़िए मुलायम के कहे का कोई असर कार्यकर्ताओं पर नहीं हो रहा। जो लोग सपा का समर्थन कर रहे थे उनका भी मोहभंग मुलायम से हो रहा है। मुलायम सिंह का जनाधार तेजी से खिसक रहा है। अमर सिंह कहते हैं कि अमिताभ बच्चन हमारे साथ हैं और अगले चुनाव में सपा का प्रचार करेंगे। अमिताभ तो पिछले विधान सभा चुनाव में भी टीवी पर सपा का प्रचार कर रहे थे लेकिन उसका असर मतदातओं पर कितना पड़ा हम देख चुके हैं। खबर है कि लखनऊ से सपा के टिकट पर शबाना आज़मी को चुनाव लड़ाया जाएगा। अमर सिंह को फिल्म इंडस्ट्री ज्यादा रास आती है। उन्हें सिने तारिकाओं के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता। चुनाव में शबाना आज़मी का क्या हस्र होगा, यह समय बताएगा।

कांग्रेस का जनाधार फिलहाल बढ़ता दिखाई नहीं दे रहा है। उसके पारम्परिक वोट सब तितर-बितर हो गए। जो बचे थे उसे रोज़मर्रा के इस्तेमाल के मूल्यों में वृद्धि ने और विमुख कर दिया है। विधान सभा चुनाव में ब्राहमण मतदाता बसपा कि तरफ झुके थे। लोक सभा चुनाव में वे कांग्रेस कि ओर पलटेंगे, इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है। मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन कांग्रेस को मिल सकता है बशर्ते मनमोहन सिंह की सरकार महंगाई पर काबू पाने में समर्थ हो। दलितों का विश्वास जीतने का राहुल गांधी का अभियान किस हद तक वोट में बदल पाएगा, कहना कठिन है। अभी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि गैर यादव पिछड़ा वर्ग सपा से विमुख हो कर किधर जाएगा। कांग्रेस के पास समर्पित कार्यकर्ताओं का भी अभाव है जो कार्यकर्ता हैं, उनकी हिम्मत जनता के पास जाने की नहीं पड़ रही है क्योंकि लगातार बढ़ती महंगाई का कोई सार्थक स्पष्टीकरण वे नहीं दे पा रहे हैं जो आम जन के गले उतरे। वह मनमोहन सरकार की कौन सी उपलब्धि ले कर जनता के पास जाएगा ? किस मुद्दे पर जनता को आकर्षित करेगा? पेट्रोलियम पदार्थों में वृद्दि का सबसे बुरा असर मध्य वर्ग पर पड़ा है। कांग्रेस के थोड़े बहुत मतदाता इसी वर्ग के हैं। मुसलमानों का समर्थन कांग्रेस को मिल सकता है क्योंकि मुसलमान कभी नहीं चाहेंगे कि भाजपा देश की सत्ता पर काबिज हो।
कांग्रेस गठबंधन की सरकार का एक मात्र विकल्प भाजपा गठवंधन है। जो पार्टियां भाजपा के गठबंधन में शामिल हैं उनका वजूद उत्तर प्रदेश में नहीं है। इसलिए सारा दारोमदार भाजपा पर ही है। कांग्रेस से मतदाताओं की नाराजगी का लाभ भाजपा को मिल सकता है। विधान सभा के चुनाव में बसपा को वोट देने वाले ब्राहमण लोक सभा चुनाव में भाजपा के पास लौट सकते हैं। क्योंकि बसपा ऐसी हालत में नहीं होगी कि केंद्र में सरकार बना सके। इस बात की पूरी संभावना है कि ठाकुर और बनिया मतदाता भी भाजपा के साथ होंगे यदि पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में यह बात घर कर गई कि छोटे-मोटे जातिवादी दलों को दिया गया वोट निर्रथक होगा तो भाजपा को वोट दे सकते हैं।

विश्व हिन्दू परिषद मंदिर और गंगा को ले कर देशव्यापी आंदोलन चलाने की योजना तैयार कर रहा है। इस आंदेलन का मकसद हिन्दू मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में लामबंद करना है। लेकिन उत्तर प्रदेश का मतदाता इस बात को जेहन में रखेगा। हिमांचल और उत्तराखंड की भाजपा सरकारों में पेट्रो पदार्थों में कमी लाने से साफ इंकार कर दिया है। यही नहीं भारतीय संस्कृति का राग अलापने वाली उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने गंगा को जगह-जगह बांधने का कार्यक्रम तैयार किया है जिससे गंगा का रहा सहा अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। उसकी योजना है कि भूमिगत सुरंग द्वारा गंगोत्री से उत्तर काशी तक गंगा का जल प्रवाहित किया जाए। इस प्रवाह को जगह-जगह बांध कर बिजली पैदा की जाए। यदि यह योजना क्रियान्वित हुई तो इससे गंगा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। गंगा से विशेष सांस्कृतिक धार्मिक लगाव रखने वाले उत्तर प्रदेश के मतदाताओं की भाजपा से नाराजगी स्वभाविक होगी। इसका असर चुनावों पर पड़े बिना नहीं रहेगा।

उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनावों के बाद सात सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं। पाँच विधानसभा और दो लोकसभा की सीटें थी। इन सभी सीटों पर बसपा की भारी मतों से विजय हुई। उसने सपा से भी सीटें छीनी और कांग्रेस तथा भाजपा के प्रत्याशियों की जमानतें जप्त हुई। ये उपचुनाव यदि लोकसभा आम चुनाव के कोई संकेत देते हैं तो कहना होगा कि कम से कम उत्तर प्रदेश में बसपा की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। मायावती के सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय नारे का जादू अभी जनता के सिर से उतरा नहीं है। गंगा की दुर्दशा की जिम्मेदारी भी मायावती के सिर नहीं मढ़ी जा सकती। इसके लिए कांग्रेस, जनता पार्टी और राजक सरकारें ही जिम्मेदार हैं और अब उत्तराखंड की भाजपा सरकार गंगा के बचे-खुचे अस्तित्व को मिटाने पर तुली है।

मायावती सरकार ने अपने एक वर्ष के कार्यकाल में ऐसा कोई कार्य नहीं किया है जिससे उसके दामन में कोई दाग लगा हो। जनता में कहीं किसी तरह का असंतोष दिखाई नहीं देता। मंहगाई को लेकर यदि असंतोष है तो उसका ठीकरा कांग्रेस के सिर ही फूटना है। बसपा का ग्राफ ऊपर रहने से विपक्षी दलों के सत्तालोभीयों का भगदड़ उसी की ओर है। ऐसे लोगों को शामिल किये जाने के बारे में बसपा को सतर्क रहना होगा। उसे नरेश अग्रवाल तथा अखिलेश दास जैसे नेताओं से बचना चाहिए था। इससे पार्टी के पुराने कार्यकर्त्ताओं में हताशा पैदा हो सकती है।

लोकसभा चुनाव नजदीक आने पर भले राजनीतिक समीकरण बदले फिलहाल तो उत्तर प्रदेश मायावती के ही हाथ में है।

शुक्रवार, 6 जून 2008

ये तो भारत पर सांस्कृतिक हमला है

आईपीएल- आईपीएल, 20-20खत्म हो गया। मुझसे किसी ने पूछा तो क्या चीयर्स लीडर्स भी वापस चली गई होंगी। मैं हंसा। क्योंकि मैने अभी भी उन्हें कई पेज थ्री पार्टियों में देखा था। कई खिलाड़ियों के साथ। आईपीएल के चेयरमैन ललित मोदी खुश हो सकते हैं कि उन्होंने कुछ गजब किया है।

लेकिन भाई ये आपने ठीक नहीं किया। मैदान पर अधनंगी लड़कियां क्यों नचवा दी। ऐसे कपड़े पहन कर मैदान में उतरी कि हल्ला मच गया।

अधनंगी लड़कियां मैदान पर जमकर अपसंस्कृति परोस रही थी। क्या भारत पर ये एक और सांस्कृतिक हमला है। मीडिया ने भी इसमें खूब मदद की। देशी-विदेशी दोनों मीडिया ने। विदेशी को तो फर्क नहीं पड़ता। लेकिन देशी मीडिया के लिए तो ये जबरदस्त मसाला था।

खेल के साथ नंगेपन का तड़का। किसी देश को पथभ्रष्ट करना है तो उसकी संस्कृति को खत्म कर दो। पश्चिमी चिंतक ऐसा सोचते हैं। पश्चिमी शासक ऐसा करते हैं। इसिलिए वो अपने जैसी सोच वालों को बढ़ावा देते हैं। भारत अब तक अटल रहा क्योंकि उसके पैर मजबूती से सांस्कृतिक विरासत की नींव पर खड़े रहे। लेकिन पश्चिम के साथ ही देश का पश्चिम परस्त नए रइसों या नए राजा इस नींव को दरकाने में पूरी तरह से लगे हुए हैं। इसी का नतीजा है क्रिकेट के मैदान पर चीयर लीडर्स की अश्लील और भोंडी हरकतें।

मनचले दर्शकों ने इनके बड़े मजे लिए। वो इनकी अश्लील हरकतों को देखकर फब्तियां कसते थे। स्टेडियम में आई संभ्रांत महिलाएं और लड़कियां शर्मसार होती रही। तो क्या पश्चिम परस्त लोग ऐसे पूरी करेंगे अपनी मंशा।

खेल अपने आप में मनोरंजक है। क्रिकेट की तो इस देश में पूजा होती है। ये दीवानगी है। धर्म है। यही वजह है कि वन डे मैच में स्टेडियम खचाखच भरा रहता है। २०-२० ने तो वन डे से ज्यादा लोकप्रियता बटोरी है। दर्शक मनोरंजन और रोमांच से सराबोर हो जाते हैं। फिर दर्शकों को क्रिकेट के अलावा इस तरह के सस्ते, अश्लील और भोंडे मनोरंजन की जरुरत क्यों? इससे तो खेल के प्रति दर्शकों की तल्लीनता खत्म होगी। खेल कम उनका ध्यान चीयर लीडर्स की तरफ ज्यादा रहता है।

मोदी जी मैदान में सिर्फ खेल होना चाहिए। नंगापन नहीं। इस भोंडेपन से खेल की गरिमा घटती है। खिलाड़ियों का ध्यान बंटता है। देश में अपसंस्कृति को बढ़ावा तो मिलता ही है। इस बार तो कर दिया।

लेकिन अगली बार ऐसा मत करिएगा। गुजारिश है आपसे। आप भी इसी देश के हैं। पवार साहब आप भी गौर फरमाइयेगा।